विश्वास की ज्योत जगाए रखनी होगी
मन एक बार जरूर सोचता है की में जो कर रहा हु वो क्या सच मैं सही हे जेसे ही उस पहेलू को सोचने लगते हे वही से अहंकार का जन्म होता हे ओर कहेता हे मन चल छोड़ वो उसी लायक ही हे ओर अहंकार ओर मन के बीच अपने रिश्ते नाते दोस्त कारोबार सब दाव पर लग जाता हे क्योंकी हमे परिणाम की चिंता नहीं अहंकार की चिंता होती हे
इस सत्य कोई में भी ओर आप भी जुटला नहीं शकते
सत्य तो लगता हे पर हम इस से आगे सोचते ही नहीं ओर सोचते हे तो ये अहंकार हमे रोक देता हे चाहो कितना भी योग सत्संग करले हम पर ये अहंकार की चादर जो हम ने अपने पर जो बिछाकर रखी हे उसे हम निकाल ही नहीं पाते बस हमे लगता हे
में ही सही हु बाकी सब मेरी नजर में गलत हे ये ही भावना हमारे घर कर जाती हे जो खुद को बदल ना चाहता हे पर वो सबकुछ त्याग करना चहता हे पर सिर्फ त्याग करने का दिखवा करता हे असल में वो मन में रागदेष लेकर चलता हे पर सामने वाला इन्सान उस पर आंख बंद कर विश्वास करता हे ओर विश्वास करने वाला इन्सान ये समझ लेता हे की अब सबकुछ अच्छा होगा नीति अपनी बदल देता हे उसके प्रती आक्रोश सबकुछ छोड़ बस एक ही बात को पकड़ लेता कल जो हुआ वो बीता हुआ कल हे आज और आने वाले दिन में बेहतर ही होने वाला हे बस इसी आशा में जीने वाला इन्सान जीता चला जाता हे पर कुछ लोग इस जेसे लोगो पर अपना विश्वास जीत लेते हे ओर धीरे धीरे उसे अपने तरफ करते है फिर ऐसा गिरा देते हे की वो फिर से खड़ा होने के लायक ही नहीं होता जिस इन्सान ने आंख बंद कर विश्वास किया उस इन्सान के प्रति आने वाले हर विचार उस इन्सान के लिए सब नजर अंदाज कर लिया ओर प्रेम की भावना उस धोखेबाज इन्सान के लिए जगाई हुई इंसानियत विश्वाश आज फिर हार गया वो समझ ने लगा चाहे जितना भी विश्वाश कर लो पर वो इन्सान अपनी ओकात जरूर बता देता हे अब उसके लिए फिर उठ कर खड़ा होना असभव लगने लगता हे वो अब किसी भी इन्सान पर विश्वास करना जहर पीना बरोबर लग रहा था अब ये सोचने लगता हे विश्वाश हारा पर अभिमान जीत गया जिन्हे अभिमान की सीढ़ी भी नही चढ़ी अब वो इन्सान उस ओर अपना रुख करे या न करे बस एक बात घर जरूर कर जाती है चाहे इन्सान कितना भी विश्वास की डोर लंबी कर ले पर जिंदगी में एक बार अहंकार के सामने पीट ही जाता हे पर जिसके रगोमें प्रेम आदर स्नमान भावना का दीप इन्सान के अंदर जीवंत हे तब तक अहंकार के आगे टूट नहीं सकता चट्टान की तरह हर मुश्केली से लड़ने के तैयार हो जाता हे पल भर की निराश की अनुभूति कर फिर हर तफ्लीको को लड़ने संघर्ष की भावना से जिंदगी के इस खेल में अपने कर्मो को बड़ा करने उतार जाता हे और खुद को अकेला समझ ने बजाय वो ये समझ कर आगे बड़ जाता हे जब इस धरती पर मेरा जन्म हुआ़ था तब मुठ्ठी बंद कर आया था पर जिंदगी ने इसे दावपेच में लपेट लिया की बंद मुठ्ठी के वजहाया था पर मुझे इस धरती से बंद मुठ्ठी खोल कर ही जाना हे था अपनी लड़ाई कियू ना में अकेला लड़ ने चल पड़ता हे
ये घटना इन्सान के जीवन में एक बार दस्तक जरूर देती हे जरूर हे जिसके जीवन में विश्वास की डोर मजबूत हुई हे उस इन्सान से कभी विश्वासघात करना नही नाही उस इन्सान को मोका देना अपने तरफ का रवैया बदलने का
विश्वास की ये गोली हे जिसे हासिल करने बरसो निकल जाते हे पर एक बार टूट जाने पर फिर से विश्वास कमाना कठिन हो जाता हे
मन को वो मोका कभी ना दो एक बार सोचने पर मजबूर हो जाए
ये विषय ही ऐसा हे जो इन्सान के जीवन में हर रूप में आता हे ओर किस्से भी हर रूप में जन्म लेता हे
जरूरत हे यहां विश्वासघात को जन्म ही ना हो
ये खयाल इन्सान के अंदर विश्वास की ज्योत जगाने चाइए इस ज्योत को जलाए रखना हर इन्सान की नैतिक जिमेदारी लेनी होगी
तभी अहंकार पर विश्वास की जीत होगी जब हम अपने स्वार्थ के लिए किसीका विश्वास नही तोड़ेंगे
विश्वास की ज्योत जगाए रखनी होगी
लेखक
धीरेन्द्र महेता




