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Thursday, September 15, 2022

सफल होना है तो संघर्ष करना जरुरी है

 

सफल होना है तो संघर्ष करना जरुरी है

 एक किसान था वो बहुत दयालु था वह हमेशा जरूरतमंदों की मदद करता। एक बार किसान अपने खेतों में काम कर रहा था तब उसे एक तितली का कोकून मिला। किसान उसे अपने घर लेकर आया और एक अच्छी सुरक्षित जगह पर रखकर उसे देखने लगा


थोड़ी देर बाद उस कोकून में एक छोटा सा छेद हुआ जिसमें से एक तितली बाहर आने के लिए बहुत संघर्ष करने लगी। किसान वहीं पर बैठकर यह सारा दृश्य देखने लगा। घंटो तक बहुत संघर्ष करने के 

बाद भी जब तितली उस कोकून को तोड़ने में असफल रही तो किसान को उस पर दया आ गई। 

किसान ने एक छोटी कैंची ली और कोकून का छेद को काटकर बड़ा कर दिया।


अब कोकून का छेद इतना बड़ा हो गया कि तितली बड़ी आसानी से उससे बाहर निकल आई । तितली को बाहर आता देख किसान भी खुश हुआ और अब किसान तितली के उड़ने का किसान इंतजार करने लगा। तितली बाहर आई तब उसके पंख बहुत छोटे और सिकुड़े हुए थे और उसका शरीर भी सूजा हुआ था। छोटे पंख और सूजा हुआ शरीर होने की वजह से वो कभी  वो कभी भी उड़ ही नहीं पाई।



बड़ा हृदय और दयालु स्वभाव वाला किसान यह समझ ही नहीं पाया की तितली के लिए कोकून से निकलने का संघर्ष ही उसे अपने आने वाली जिंदगी में उड़ने के काबिल बनाता है।


इस कहानी से हमने क्या सीखा?


दोस्तों यह कहानी हमें सिखाती है कि जीवन में आने वाली कठिनाइयां और संघर्ष ही हमें मजबूत और विकसित बनाती है। इसीलिए हमें समस्याओं का सामना स्वयं ही करना चाहिए। दूसरों पर निर्भर नहीं होना चाहिए।

Thursday, April 7, 2022

जिंदगी मैं तुजे बहुत कुछ शिखना है


जिंदगी मैं तुजे बहुत कुछ शिखना है 


बरसों से एक बात जरूर सुनता आया हु  जिंदगी मैं तुजे बहुत कुछ शिखना है  और बहुत कुछ देखना है पर ये लोग कीयु बोलते थे वो पता नही 
आज धीरे धीरे समझ आ रहा है इतनी आसन नहीं होती इस जिंदगी को जीना 
हर कदम पर कुछ ना कुछ शिखा ही देती है ये जिंदगी कुछ अच्छे लम्हों के साथ तो कुछ बुरे लम्हों के साथ सारी कड़ी जुड़कर रहे जाती हे जिंदगी के साथ हर लब्ज़ सही साबित भी होते तो कही लब्ज़ अपने आप पर हावी भी होते है ये सब जिंदगी को महेशूस करने से हीं  पता चलता हे  जिदंगी ही एक  संघर्ष  है उसके बिना कुछभी हासिल नहीं होता जो शॉर्टकट से हासिल किया हुवा मुकाम लंबे समय तक रहेता नहीं है  बस संघर्ष ही जिंदगी का परियाय है उसके बिना जिंदगी के हर पहलू जिंदगी के साथ जीते ही पता चल जाता  है की कोनसा इन्सान किस ओर चला जा रहा है

ये सब अपनी आखों से देखा हुवा वो सच है जो कोई भी इन्सान जुटला नहीं शकता 

आज पता चल रहा है की लोग कीयु कहेते थे बहुत कुछ शिखना और देखना बाकी है 


लेखक
धीरेन्द्र महेता

Friday, October 22, 2021

संघर्ष कोई भी हो पर त्याग की बड़ी भूमिका होती हे


 जिन्होंने बचपन खोया वही लोगों ने अपना इतिहास  बनाया इतिहास के पन्नों से जब भी पन्ने फिरा ओगे तब इन महापुरषों का जीकर होगा जेसे श्री सरदार वल्लभ भाई पटेल डॉक्टर अंबेडकर वीर सावरकर अब्दुल कलाम ऐसे कई  लोगों ने अपना बचपन खोया और उन्होंने इतिहास बनाया हिम्मत नही  हारे ओर हौसला बनाए रखा 

जीवन मे एक बार किस्मत  मौका देती है 
बस उस मौके का फायदा उठाना हे और उसे पकड़ कर जीत की ओर बढ़ जाना हे वो लम्हा हमें ले आना हे जहा इतिहास के पन्नो पर अपना नाम सुनहरे अक्षरों मे लिखा जाए  यह प्रेरणा हमारे दिल में जगाना हे 

कइयों ने तो अपनी जिंदगीअभी बनाचुके हे और कई लॉग अपनी जिंदगी के अच्छे मुकाम तक पहुंचने के लिए  सबकुछ दाव पर है आज वो अपना इतिहास बनाने संघर्ष में जुड़े हे ईन्ही ने अपना युवानी का हसीन पल खोया हे बचपन खोया हे  हर व्यक्ति में किसी ना किसी तरह अपना कुछना कुछ छोड़ कर आज अपनी जिंदगी मे संघर्ष कर रहें हे क्योंकि इनका भविष्य इनके ही हाथ हे इसी लिए ये जो भी त्याग करते हे आने वाले कल में खुद को बेहतर पाने के लिए खुदका ओर देश का भविष्य के  लिए संघर्ष की सीढ़ियां चडते हे  l

बचपन हो युवान नी का कोई पल जोभी हो  जो हर कोई याद रखना चाहता हे  जब ये दो किरदार जिंदगी में दांव पर लगाते हे तो यकीन मानिए इन लोगो का इतिहास बनता हे

इन में से जीता जागता  प्रेरणा स्त्रोत हे तो माननीय नरेन्द्र मोदी जिन्हो ने अपने आप को संग्रश में उतारा ओर बडी कठीन परिस्थियो से गुजरते हुवे इन्होंने अपने आपको साबित किया ओर विश्वाश बनाया मुख्यमंत्री बने ओर आज के दौर प्रधानमंत्री बने ओर दुनिया अपने नाम का और देश का नाम रोशन किया
मुझे  गर्व  हे की मेरे जीते जी इन महान पुरष का वर्तमान के युग मे  सहभागी होने का अवसर मिला जब जब इस दशक का जिक्रर होगा तब इस पल का अहसास होगा

संघर्ष कोई भी हो पर त्याग की बड़ी भूमिका होती हे

लेखक 
धीरेन्द्  महेता

Tuesday, August 17, 2021

अभिमान सही है या विश्वास सही है





मन एक बार जरूर सोचता है की में जो कर रहा हु वो क्या सच मैं सही हे जेसे ही उस पहेलू को सोचने लगते  हे वही से अभिमान का जन्म होता हे ओर कहेता हे मन चल छोड़  वो उसी लायक ही हे ओर अभिमान ओर मन के बीच अपने रिश्ते  नाते दोस्त कारोबार  सब दाव पर लग जाता हे क्योंकी हमे परिणाम की चिंता नहीं अभिमान की चिंता होती हे
इस सत्य कोई में भी ओर आप भी जुटला नहीं शकते 

सत्य तो लगता हे पर हम इस से आगे सोचते ही नहीं ओर सोचते हे तो ये अभिमान हमे रोक देता हे चाहो कितना भी योग सत्संग  करले हम  पर ये अभिमान की चादर जो हम ने अपने पर जो बिछाकर रखी हे उसे  हम निकाल ही नहीं पाते बस हमे लगता हे 
में ही सही हु बाकी सब मेरी नजर में गलत हे ये ही भावना हमारे घर कर जाती हे जो खुद को बदल ना चाहता हे पर वो सबकुछ त्याग करना चहता हे पर सिर्फ  त्याग करने का दिखवा करता हे असल में वो मन में रागदेष लेकर चलता हे पर सामने वाला इन्सान उस पर आंख बंद कर विश्वाश करता हे ओर विश्वाश करने वाला इन्सान ये समझ लेता हे की अब सबकुछ अच्छा होगा नीति अपनी बदल देता हे उसके प्रती आक्रोश सबकुछ छोड़ बस एक ही बात को पकड़ लेता कल जो हुआ वो बीता हुआ कल हे आज और आने वाले दिन में बेहतर ही होने वाला हे बस इसी आशा में जीने वाला इन्सान जीता चला जाता हे पर कुछ लोग इस जेसे लोगो पर अपना विश्वाश जीत लेते हे ओर धीरे धीरे उसे अपने तरफ करते है फिर ऐसा गिरा देते हे की वो फिर से खड़ा होने के लायक ही नहीं होता  जिस इन्सान ने आंख बंद कर विश्वाश किया उस इन्सान के प्रति आने वाले हर विचार उस इन्सान के लिए सब नजर अंदाज कर लिया ओर प्रेम की भावना उस धोखेबाज इन्सान के लिए  जगाई हुई इंसानियत विश्वाश आज फिर हार गया वो समझ ने लगा चाहे जितना  भी विश्वाश कर लो पर वो इन्सान अपनी ओकात जरूर बता देता हे अब उसके लिए फिर उठ कर खड़ा होना असम्भव लगने लगता हे वो अब किसी भी इन्सान पर विश्वाश करना जहर पीना बरोबर लग रहा था अब ये सोचने लगता हे विश्वाश  हारा पर अभिमान जीत गया  जिन्हे अभिमान की सीढ़ी भी नही चढ़ी अब वो इन्सान उस ओर अपना रुख करे या न करे बस एक बात घर जरूर कर जाती है  चाहे इन्सान कितना भी विश्वाश की डोर लंबी कर ले पर जिंदगी में एक  बार अभिमान के सामने पीट ही जाता हे पर जिसके रगोमें प्रेम आदर स्नमान भावना का दीप  इन्सान के अंदर जीवंत हे तब तक अभिमान  के आगे टूट नहीं सकता चट्टान की तरह हर मुश्केली से लड़ने के तैयार हो जाता हे पल भर की निराश की अनुभूति कर फिर हर तफ्लीको को लड़ने संघर्ष की  भावना से जिंदगी के इस खेल में अपने कर्मो को बड़ा करने उतार जाता हे और खुद को अकेला समझ ने बजाय वो ये समझ कर आगे बड़ जाता हे जब इस धरती पर मेरा जन्म हुआ़ था तब मुठ्ठी बंद कर आया था पर जिंदगी ने इसे दावपेच में लपेट लिया की बंद मुठ्ठी के वजहाया था पर मुझे इस धरती से बंद मुठ्ठी खोल कर ही जाना हे था अपनी लड़ाई कियू ना में अकेला लड़ ने चल पड़ता हे

ये घटना इन्सान के जीवन में एक बार दस्तक जरूर देती हे जरूर हे जिसके जीवन में विश्वाश की डोर मजबूत हुई हे उस  इन्सान से कभी विश्वासघात  करना नही नाही उस इन्सान को मोका देना अपने तरफ का रवैया बदलने का 

विश्वास की  ये गोली हे जिसे हासिल करने बरसो निकल जाते हे पर एक बार टूट जाने पर  फिर से विश्वाश कमाना कठिन हो जाता हे

मन को वो मोका कभी ना दो एक बार सोचने पर मजबूर हो जाए 

ये विषय ही ऐसा हे जो इन्सान के जीवन में हर रूप में आता हे ओर किस्से भी  हर रूप में  जन्म लेता हे
जरूरत हे यहां विश्वासघात को जन्म ही ना हो 
ये  खयाल इन्सान के अंदर विश्वासकी ज्योत जगाने चाइए  इस ज्योत को जलाए रखना हर इन्सान की नैतिक जिमेदारी लेनी होगी  

तभी अभिमान पर विश्वास की जीत होगी जब हम अपने स्वार्थ के लिए किसीका विश्वाश नही तोड़ेंगे

विश्वाश की ज्योत जगाए रखनी होगी

लेखक
धीरेन्द्र महेता

Sunday, August 1, 2021

बालक की ईमानदारी ने कुछ हमे शिखाया

                 बालक की ईमानदारी 

एक छोटे से गाँव में नंदू नाम का एक बालक अपने निर्धन माता-पिता के साथ रहता था। एक दिन दो भाई अपनी फसल शहर में बेचकर ट्रैकटर से अपने गाँव रहे थे। फसल बेचकर जो पैसा मिला वह उन्होंने एक थैले में रख लिया था। अचानक एक गड्ढा गया और ट्रकटर उछला और थैली निचे गिर गई जिसे दोनों भाई देख नहीं पाए और सीधे चले गए।

 

बालक नंदू खेलकूद कर रात को अँधेरे में अपने घर जा रहा था। अचानक उसका पैर किसी वस्तु से टकरा गया। उसने देखा तो पता चला कि किसी की थैली है। जब नंदू ने थैली खोलकर देखा तो उसमे नोट भरे हुए थे। वह हैरान हो गया  और सोचने लगा कि पता नहीं किसकी थैली होगी। उसने सोचा कि अगर वह थैली यही छोड़ गया तो कोई और इसे उठा ले जाएगा। वह मन ही मन सोचने लगा कि जिसकी यह थैली है उसे कितना दुख और कष्ट हो रहा होगा।

 

हालाँकि लड़का उम्र से छोटा था और निर्धन माँ-बाप का था लेकिन उसमें सूझबूझ काफी अच्छी थी। वह थैली को उठाकर अपने घर ले आया। उसने थैली को झोपडी में छुपाकर रख दिया फिर वापस आकर उसी रास्ते पर खड़ा हो गया। उसने सोचा कि कोई रोता हुआ आएगा तो पहचान बताने पर उसे थैली दे दूंगा।

 

इधर थोड़ी देर बाद दोनों भाई घर पहुँचे तो ट्रकटर में थैली नहीं थी। दोनों भाई यह जान निराश होते हुए बहुत दुखी होने लगे। पुरे साल की कमाई थैली में भरी थी। किसी को मिला भी होगा तो बताएगा भी नहीं। शायद अभी वह किसी के हाथ लगा हो यह सोच दोनों भाई टोर्च लेकर उसी रास्ते पर चले जा रहे थे।

 

छोटा बालक नंदू उन्हें रास्ते में मिला। उसने उन दोनों से कुछ भी नहीं पूछा लेकिन उसे शंका हुई कि शायद यह थैली इन्ही की ही हो। उसने उनसे पूछा, ‘आप लोग क्या ढूंढ रहे है?” उन्होंने उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं दिया। उसने दोबारा पूछा, “आप दोनों क्या ढूंढ रहे हो?” उन्होंने कहा, “अरे कुछ भी ढूंढ रहे है तू जा तुझे क्या मतलब।

 

दोनों आगे बढ़ते जा रहे थे। नंदू उनके पीछे चलने लगा। वह समझ गया था कि नोटों वाली थैली संभवता इन्हीं की ही है। उसने तीसरी बार फिर पूछा तो चिल्लाकर एक भाई ने कहा, “अरे चुप हो जा और हमें अपना काम करने दे। दिमाग को और ख़राब कर।अब नंदू को समझ गया की वह थैली अवश्य इन्हीं की ही है। उसने फिर पूछा, ‘”आपकी थैली खो गई है क्या?”

 

दोनों भाई एकदम रुक गए और बोले, “हाँ।नंदू बोला, “पहले थैली की पहचान बताइए। जब उन्होंने पहचान बताई तो बालक उन्हें अपने घर ले गया। टोकरी में रखी थैली उन दोनों भाइयों को सौंप दी। दोनों भाइयों की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं था। नंदू की ईमानदारी पर दोनों बड़े हैरान थे। उन्होंने इनाम के तौर पर कुछ रूपए देने चाहे पर नंदू ने मना कर दिया और बोला, “यह तो मेरा कर्तव्य था।

 

दूसरे दिन दोनों भाई नंदू के स्कूल पहुँच गए। उन्होंने बालक के अध्यापक को यह पूरी घटना सुनाते हुए कहाहम सब विद्यार्थियों के सामने उस बालक को धन्यवाद देने आए हैं। अध्यापक के नेत्र से आँसू गिरने लगे। उन्होंने बालक की पीठ थपथपाई और पूछा, “बेटा, पैसे से भरे थैले के बारे में अपने माता-पिता को क्यों नहीं बताया।नंदू बोला, “गुरूजी, मेरे माता-पिता निर्धन हैं। रुपयों को देखकर उनका मन बदल जाता तो हो सकता है रुपयों को देखकर उसे लौटाने नहीं देते और यह दोनों भाई बहुत निराश हो जाते। यह सोच मैंने उन्हें नहीं बताया।

 सभी ने नंदू की बड़ी प्रशंसा की। दोनों भाइयों ने उसे कहा, “बेटा धन्यवाद। गरीब होकर भी तुमने ईमानदारी को नहीं छोड़ा।

 


    लेखक 

धीरेन्द्र महेता

 

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