खोया सा मन है मेरा
छाई है बैचेनी हर सोच के पीछे और एक सोच चलती है रास्ता दिल ने खोया है या मेरे मन ने दिमाग भी अब सुन्न हो जा रहा है मोटीवेशन के फॉर्मूलाभी फेल होते नजर आ रहे ही अगर कुछ पाया है तो खुशी नहीं है कुछ आशा बाध कर रखी भी है तो ये पूरी हुई भी कहा है बस खोया हुवा मन मेरे सवालो के जवाब खोजने लगा हे जाने कीयु मन मेरा कीन घेराव में फसा है आज इसी सवालों के बीच सोच जंजीरो में जकड़ी हुई नजर आ रही है खोया हुवा मन जाने क्यों बैचेन हो रहा है इसी सवालों में हम क्यों फसे जा रहे है.......खोया सा मन है मेरा मन कियू फसा जा रहा है........
लेखक
धीरेन्द्र महेता

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