दुसरो की लकीर कम करने से अच्छा अपनी लकीर बड़ी करना शीखो
हम ये सोचते है की हमारी लकीर बड़ी हे हमें कुछ डर नहीं इसलिये वो दुसरो की बढ़ती लकीर को छोटी करने की कोशिश करते हे उसे आगे बढ़ने रोखते है
क्युकि इनको डर है उसकी बढ़ती लकीर का कही उनकी लकीर छोटी ना हो जाये इस वजह से हम उस व्यक्ति के प्रति देखने का नजरिया बदल देते हे
और वो व्यक्ति हमें ना पसंद लगता हे पर हम उसकी हर बातको ना सुनकर उसे रोक देते है या उसे हा हा ठीक है ये कहे कर हम उस बात को अनसुना कर देते है ओर उसके विचार को नहीं देखते नाही गौर करते या हम उसकी बातको मजाक में उड़ाना शुरू कर देते है वो छोटा आदमी क्या करता वो अपने उपरी अधिकारी से परेशान होता है कयोकी वो उसे ऊपर आने ही नहीं देता पर वो अपने काम पर निष्ठावान होता है पर वो कुछ नहीं कर पाता पर बड़ी लकीर वाले ऐसे लोगो को परेशान करने में एक भी कसर छोड़ ते नहीं है
जैसे मान लो आपके पास आकर कहेता है आज जल्द जाने मिलेगा हम कहेते है आज काफी काम है आज आप नहीं जा सकते ओर बिचारा क्या करता वो फिर काम मै लग जाता है ओर तय किये समय उनुसार चला जाता हे या हम बहुत कुछ सूना कर जाने देते हे ओर उसे निराश कर अपने तरफ देखनेका नज़रिया बदलने के लिए मजबुर करते है ओर वो हमारी बुराई पीठ पीछे करता है
पर इस्के जिम्मेवार हम ही है जल्दी तो गया पर क्या लेकर गया उस समय उसने जेली परेशानी किसीको नज़र नहीं आती
हम ओरो को ये जताते है की देखा कितना दबदबा है हमारा हमे कोई बोलने वाला नहीं मै जो भी कर रहा हूं वो कंपनी के नियम अनुसार ही कर रहा हूं पर वो ये नहीं जानते की उस व्यक्ति ने अपने साथ एक ही बात ले गया कितना भी काम करो पर कोई फायदा नहीं उपरी अधिकारी के रहेते हम छोटे के छोटे ही रहेंगे उसे दूसरो के प्रति कोई लगाव नहीं है ओर वो छोटा व्यक्ति अपना दायरा सीमित कर लेता है
उपरी अधिकारी जबतक ये नहीं सोचेगे की मै भी छोटे दायरे से इस बड़े दायरे में आया हूं अगर में उस छोटी लकीर को बड़े लकीर में सामिल करुगा तो मेरी भी लकीर अपने आप बड़ी होगी पर ये सिर्फ ओर सिर्फ अपना स्वार्थ देखते है ओर साहेब के सामने छोटे कर्मचारी की बुराइयां शुरु कर देता है ये जताता है की मै कितना ध्यान देता हूं बस ये जताने के चक्कर में रात दिन लगा रहेत्ता है
इस समाज में हर व्यक्ति को आगे बढ़ने का अधिकार है जब तक उपरी अधिकारी छोटे कर्मचारी के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चले तो एक दिन हम अपनी टहनी हम खुद ही काट लेगे ओर हम उस समय कुछ नहीं कर पायेगे
जरूरत है सिर्फ ओर सिर्फ एक बात समझ ने की
हम ऐसे क्षेत्र में काम करते है जहा ये भेदभाव करने की जरूरत क्यो है ?
आज हमे एक बात समझे की जरूरत है
जब हम अपनी लकीर बड़ी करते रहेगे और वो अपनी छोटी लकीर बड़ी करते रहेगे तब छोटी बड़ी दोनो में तालमेल होगा तब वो दिनभी कुछ और होगा तब छोटी लकीर का फासला मिट जाएगा और हर होदे के अफसर मिल जुलकर काम करते नजर आए गे
तब कोई प्रतिस्पर्धी नहीं होगा
लेखक धीरेन्द्र महेता
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